बकस्वाहा की 39 पंचायतों में दो करोड़ से अधिक खर्च — फिर भी अंतिम यात्रा की गरिमा तार-तार, लोग बोले यह श्मशान घाट हैं या भ्रष्टाचार के खंडहर

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आशीष चौरसिया बकस्वाहा। बकस्वाहा जनपद की 39 पंचायतों में 80 श्मशान घाट बने, लेकिन एक भी उपयोग लायक नहीं हैं। जिनमें से अधिकांश श्मशान घाट के टिन शेड भी गायब हो चुके हैं,जिसके चलते लोग बारिश और कीचड़ के बीच अंतिम संस्कार करने को मजबूर हैं। इस पूरे मामले में चौकाने वाली बात तो है कि श्मशान घाट से गायब हुए टिन शेड की कही किसी ने चोरी की एफआईआर तक दर्ज नहीं करवाई हैं। किसी सभ्य समाज के लिए इससे ज्यादा शर्मनाक तस्वीर क्या हो सकती हैं, हिन्दू सनातन धर्म के अनुसार श्मशान घाट जो जीवन की अंतिम यात्रा का सबसे पवित्र स्थल माना जाता है।वहीं,बकस्वाहा जनपद की 39 पंचायतों में करोड़ों रुपये की लागत से बने 80 श्मशान घाट आज मात्र नाम के लिए बचे हैं, जहां वह बदहाली, गंदगी और सरकारी उपेक्षा का प्रतीक बन चुके हैं।

करोड़ों खर्च हुए — नतीजा शून्य

वर्ष 2015-16 में प्रत्येक पंचायत में औसतन ₹2.20 लाख की लागत से टिन शेड और चबूतरे सहित श्मशान घाटों का निर्माण किया गया था। योजनाएं बनीं, बजट स्वीकृत हुआ, निर्माण हुआ — लेकिन आज की स्थिति यह है कि जनपद की किसी भी पंचायत में एक भी टिन शेड सुरक्षित नहीं बचा है।

ना टिन शेड, ना शिकायत — सब सन्नाटा

कई पंचायतों में तो टिन शेड लगाए ही नहीं गए। जहां लगाए गए, वहां से चोरी हो गए। हैरानी की बात यह है कि अब तक किसी भी सरपंच द्वारा चोरी की एफआईआर तक दर्ज नहीं कराई गई है।

तो सवाल उठता है — जब 2 करोड रुपए खर्च होने के बाद भी एक भी श्मशान घाट उपयोग लायक नहीं बचा तो इसका जिम्मेदार कौन है, क्या यह महज लापरवाही है या सरकारी धन का योजनाबद्ध तरीके से किया गया सुनियोजित भ्रष्टाचार हैं।

बरसात बनी मुसीबत, अंतिम संस्कार बना संघर्ष

इन दिनों हो रही झमाझम बारिश ने स्थिति और भी दयनीय कर दी है। कई श्मशान घाटों में जलभराव, कीचड़ और बदबू फैली हुई हैं जिसके चलते लोगों को अपनों का अंतिम संस्कार कीचड़ में खुले आसमान के नीचे करना एक संघर्ष बन चुका है। ऐसा ही एक ताज़ा मामला ग्राम पंचायत के बाजना में देखने को मिला हैं। जहां हाल ही में एक बुजुर्ग का निधन हो गया जब परिजन शव लेकर श्मशान पहुंचे तो वहां चारों ओर कीचड़ और गंदगी देख हतप्रभ रह गए। मजबूरी में ईंट-पत्थर लगाकर चिता सजाई गई।

श्मशान में भी इज्जत नहीं बची — ग्रामीणों का आक्रोश

ग्रामवासियों में मोहन, अशोक, हरिदास, सरजू, कैलाश, मनीष, बाबूलाल, डमरू, भूरिया, उत्तम, बहोरा, पप्पू, अच्छे, प्यार सहित अनेक लोगों ने तीखा रोष जताते हुए कहा कि हमने सड़कें, राशन और पेंशन की कमी तो सह ली, लेकिन अब तो यहां मरने के बाद भी चैन नहीं हैं ! जनपद सदस्य शकुन मोहन और मृतक के परिजन हरिदास ने कहा कि सरकार गरिमा की बात करती है, लेकिन ज़मीनी सच्चाई यह है कि श्मशान घाटों में शव जलाने तक की इज्जत नहीं बची।

ग्रामीणों ने सरकारी सिस्टम पर आरोप लगाते हुए कहा कि यह श्मशान घाट हैं या भ्रष्टाचार के खंडहर हैं, अगर दो करोड़ रुपये से अधिक खर्च होने के बावजूद एक टिन शेड तक नहीं बचा, तो क्या सिर्फ बारिश ज़िम्मेदार या सिस्टम में घुसा कोई भूत हैं। ग्रामीणों ने दो टूक कहा है कि अब और सहन नहीं करेंगे।

अंतिम यात्रा का अपमान अब नहीं सहा जाएगा। या तो व्यवस्था सुधरे, या फिर उग्र आंदोलन होगा।

इनका कहना हैं !

सभी पंचायतों के श्मशान घाटों की स्थिति की समीक्षा की जाएगी। जिला पंचायत से चर्चा कर जो भी दोषी पाए जाएंगे, उन पर कार्रवाई की जाएगी l

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Author: Parinda Post

सरहदें इंसानों के लिए होती हैं, परिंदा तो आज़ाद होता है !

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