24 घंटे तक अस्पताल में सड़ता रहा शव, डॉक्टर ने तहसीलदार-विधायक की भी ना मानी — मृतका के परिजन दर-दर भटके

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आशीष चौरसिया बकस्वाहा। मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले के बकस्वाहा सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में शुक्रवार को चिकित्सा सेवा और मानवीयता दोनों को शर्मसार कर देने वाला वाकया सामने आया, जहाँ एक वृद्ध महिला का शव 24 घंटे तक पोस्टमार्टम के इंतज़ार में पड़ा रहा, लेकिन डॉक्टरों की लापरवाही और हठ के चलते शव की भी अंतिम इज्जत वक्त पर नसीब न हो सकी। बदइंतजामी और संवेदनहीनता की सारी हदें तब पार हो गईं, जब न तो तहसीलदार के निर्देशों को तवज्जो दी गई, और न ही क्षेत्रीय विधायक रामसिया भारती की मौजूदगी का कोई असर डॉक्टरों पर पड़ा। ग्राम पंचायत केरवारा के ग्राम सलैया निवासी मृतका के पुत्र प्रकाश लोधी ने जानकारी देते हुए बताया कि शुक्रवार की शाम को 70 वर्षीय वृद्धा पानबाई पत्नी शंकर लोधी की कीचड़ में फिसलकर गिरने से मौके पर ही मौत हो गई थी। मृतका मूलतः दमोह जिले के कारिजो खैजरा की निवासी थीं। घटना की जानकारी मिलते ही थाना प्रभारी सुनीता बिंधुआ ने तत्काल मौके पर पहुंचकर मर्ग कायम किया और शव को पोस्टमार्टम के लिए सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र बकस्वाहा भिजवाया। लेकिन यहां स्वास्थ्य केंद्र की लापरवाही और असंवेदनशीलता ने मृतका के परिजनों को गहरे दुख और असहायता में धकेल दिया। शाम तक पोस्टमार्टम नहीं किया गया और अगले दिन सुबह 11 बजे तक भी केवल जर्जर पोस्टमार्टम भवन का हवाला देकर परिजनों को बड़ामलहरा रेफर करने की सलाह दे दी गई। वहां से भी सहायता न मिलने पर परिजनों की पीड़ा और भी बढ़ गई।

सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पहुंचे तहसीलदार, डॉक्टर ने दिखाई बेरुख़ी

मृतका के परिजनों ने जब बार-बार गुहार लगाने के बाद भी राहत नहीं पाई, तो अंततः थक-हारकर वे तहसीलदार भरत पांडे के पास पहुँचे। मामले की गंभीरता को देखते हुए तहसीलदार स्वयं सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पहुँचे, लेकिन डॉक्टर अपने चेंबर से बाहर आने को भी तैयार नहीं हुए। न तहसीलदार के मौखिक निर्देश माने गए और न ही प्रशासनिक पद की गरिमा का मान रखा गया। इस घटनाक्रम ने न केवल मानवता को शर्मसार किया बल्कि यह भी उजागर किया कि किस तरह शासन के प्रतिनिधियों की बात तक अब सरकारी व्यवस्थाओं में अनसुनी हो रही है।         

इस पूरे मामले में तहसीलदार भरत पांडे का कहना हैं कि पोस्टमार्टम हाउस की हालत वाकई जर्जर है। एसडीएम महोदय के निर्देश पर बकस्वाहा नगर परिषद को कहा गया है कि तीन दिन के भीतर वहां टिन शेड लगाकर वैकल्पिक इंतज़ाम किए जाएं, जिससे आमजन को ऐसी परेशानी न उठानी पड़े। अस्पताल प्रबंधन को चाहिए कि इस तरह की संवेदनशील परिस्थितियों में मृतकों और उनके परिजनों के साथ मानवीय व्यवहार करे।

विधायक पहुंची , तब भी नहीं जागी संवेदनशीलता डॉक्टर ने नहीं की कोई बातचीत

परिजनों की व्यथा और तहसीलदार के प्रयासों के बाद भी जब स्थिति जस की तस बनी रही, तो पीड़ित परिवार ने क्षेत्रीय विधायक रामसिया भारती से संपर्क किया। जनप्रतिनिधि होने का फर्ज निभाते हुए विधायक ने अपने सभी निर्धारित कार्यक्रम स्थगित किए और तुरंत सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पहुँचीं। लेकिन दुर्भाग्यवश उनकी उपस्थिति का भी कोई असर अस्पताल प्रबंधन पर नहीं पड़ा। प्रतिनिधि संजय दुबे जब डॉक्टर को बुलाने पहुँचे तो “पेशेंट देखने का बहाना” बना दिया गया। मजबूरन विधायक को स्वयं डॉक्टर के कक्ष में जाना पड़ा और उन्होंने स्वास्थ्य केंद्र के इस रवैये पर कड़ा विरोध दर्ज कराया। इसके बाद उन्होंने फोन पर मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी सीएमएचओ से शिकायत की। तब कहीं जाकर लगभग दो घंटे के भीतर, उसी जर्जर भवन में पोस्टमार्टम की औपचारिकता पूरी की गई। विधायक रामसिया भारती ने अस्पताल प्रबंधन पर तीखा प्रहार करते हुए कहा कि कल शाम से शव अस्पताल में पड़ा है और डॉक्टर संवेदनहीन बने बैठे हैं। तहसीलदार जैसे प्रशासनिक अधिकारी की बात को भी अनसुना कर दिया गया — यह न केवल अनुशासनहीनता है, बल्कि मानवीय मूल्यों की भी हत्या है। यदि यह रवैया नहीं बदला गया तो मैं बाध्य होकर उच्य अधिकारीयों से कड़ी कार्रवाई की मांग करूंगी।

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Author: Parinda Post

सरहदें इंसानों के लिए होती हैं, परिंदा तो आज़ाद होता है !

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